साथी रणेंद्र से इस उपन्यास के बारे में लम्बे समय से चर्चा होती रही है. जिस मोड़ से हमारा देश गुजर रहा है-अगले पांच वर्षों में बहुत कुछ हो जाने की संभावनाएं-आशंकाएं सामने आ रही हैं. जिस तरह से कारपोरेट जगत भारत की दलाल सत्ता व्यवस्था की मदद से हमारा सब कुछ छीन कर मुनाफे के आपने तंदूर को गर्म रखना चाहता है-उसमें हम सब भुन कर कोयला हो जायेंगे या पकी मिटटी की तरह झनझनाते हुए बाहर निकलेंगे-यह अभी तय नहीं है. उम्मीद की किरण वे लोग हैं-वह जनता है- जो इस प्रक्रिया के खिलाफ अपना सब कुछ गँवा कर भी लड़ने को तैयार हैं. हम उम्मीद करते हैं कि वे विजयी रहें. हमारा भविष्य भी उन के विजय पर निर्भर करता है. पढ़िए इस पुस्तक का एक अंश, जिसे लेखक की अनुमति से यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है.
ग्लोबल गांव के देवता
इक्कीसवाँ अध्याय
पाथरपाट पुलिस चैकी में भी फोर्स भर गया था । सशस्त्र बल के जवान इलाके में हर कहीं दिख रहे थे । लेकिन इस बार लालचन दा, डाॅक्टर रामकुमार और उनके साथियों की गिरफ्तारी नहीं हो पा रही थी । विधायक जी और शिवदास बाबा के दबाव से जिला प्रशासन थोड़ी दुविधा में था ।
पाट पर लालचन दा की ‘संघर्ष समिति’ ने जनता कफ्र्यू लगा दिया । अन्दर गाँवों में पुलिस-प्रशासन का आना जाना बन्द । गिरफ्तारी के बहाने घरों में घुसते हैं और बेटी-बहुओं का दुरगिंजन करते हैं । सखुआ के पेड़ों को काट कर हर गाँव के मुहाने पर चेकनाका बना दिया गया था । पूरी सड़क को घेरे हुए मोटे तने का एक अवरोधक । एक छोर पर पत्थरों के भार से बँधा हुआ दूसरी छोर पर मजबूत रस्सियों से झुका कर छोटे खम्भों के सहारे बँधा हुआ । गाड़ी के तो आने-जाने का सवाल ही नहीं । साइकिल, आदमी, गाय-गरू किनारे से पार करने भर रास्ता छोड़ा हुआ । ये चेकनाका ‘संघर्ष समिति’ के कार्यकत्र्ताओं के घर के सामने ही बने थे । जैसे ही रात-बिरात कोई पुलिस जीप आती, रूक कर वे चेकनाका खोलने लगते । सामने घर मंे नगाड़ा बजने लगता और दस मिनट में गाँव के सभी मर्द-औरत इकट्ठे हो जाते । जीप के सामने यहाँ से वहाँ तक चुपचाप बैठ जाते । कोई-कोई हवलदार-दरोगा माई-बहन की गाली-वाली देकर या बेंतों से खोंच -खाँच कर उत्तेजित करने की कोशिश करता, किन्तु चुप और शान्त भीड़ के प्रतिरोध से लाचार होकर पुलिस को लौटना पड़ता ।
लालचन दा के भरोसे ही लड़ाई चल रही थी । किन्तु लालचन दा खुद पहले जैसे नहीं रह गए थे । बदले-बदले से थे । चाचा के हत्यारे की गिरफ्तारी अब तक नहीं होना, पुश्तैनी धनहर खेत का खानदान के हाथ से निकल जाना , बालचन के दवा-दारू में हाथ का खाली होना, बेटियों का आश्रम स्कूल में बेइज्जत होना । इन सारी घटनाओं ने उनकी निश्छल हँसी उनसे छीन ली थी । उनके ललाट की चमक मटमैली पड़ गई । कपड़े-लत्ते की साफ-सफाई पर भी उतना ध्यान नही रहता । पाट के सबसे सम्मानित परिवार के सदस्य होने, प्रभावी होने का आत्मविश्वास कहीं टूटा था ।
ललिता से सहिया जोड़ने के कारण अम्बाटोली मेरा आना-जाना घटा तो नहीं था, थोड़ा बढ़ ही गया था, किन्तु लालचन भौजी का देवर वाला गीत अब सुनने को नहीं मिलता । हाँ, हमारी सहिया फूल फूलझर झरना वाला गीत अक्सर सुनाया करती थी । लेकिन भौजी तो भौजी थी, उनकी जगह फूल कैसे ले सकता था ।
रूमझुम भाई की नशाखोरी से भी हो सकता है लालचन दा थोड़ा अकेलापन महसूस करते हों । डाॅक्टर साहब की अपनी व्यस्तताएँ थीं । इधर-उधर ही रहते हों किन्तु पाट के रोगी उन्हें खोज ही लेते थे । माँ-बहनों की चिन्ता भी उन्हें करनी ही पड़ती थी । सोमा-भीखा जैसे लड़के रूमझुम की जगह नहीं ले सकते थे । एक ही शख्स उस कमी को पूरा कर सकता था, वही थी मेरी फूल । किन्तु काका-भतीजी एक-दूसरे से खुले ही नहीं थे । बचपन से कभी साथ बैठ कर बातचीत की आदत ही नहीं थी । सारी बात काकी के माध्यम से कहती आई थी । अब एकाएक मुँह लगा कर कैसे बोल सकती थी ? इतनी भी बड़ी नहीं हो गई थी । मीटिंग-उटिंग में भी पीछे ही बैठती । बुधनी दी बहुत कोशिश करती, उनके साथ आगे की पाँत में बैठे, लेकिन ललिता सुनती कहाँ थी ?
उस दिन मेरे स्कूल जाने के पहले रूमझुम-ललिता मेरे कमरे में आए । साल भर में पूरे अल्कोहालिक हो गए थे रूमझुम । आँख के पपोटे और चेहरा सूजा हुआ । सुना था, अब तो सबेरे जागते हैं तो कुल्ला भी महुआ की पहली धार से करते हैं । उनके बाबा (पिता) तो कन्दापाट में रहते नहीं हैं । बीस मील दूर जिस स्कूल में पोस्टिंग है, वहीं रहते हैं । सुनील यूनिवर्सिटी हाॅस्टल से आता ही नहीं है । आयो (माँ) डाँट ही नहीं पाती है, केवल बेहाथ होते बेटे और सोने जैसी उसकी देह को गलता देख रोती रहती है । एतवार को जब बाबा आते हैं तो रूमझुम गायब रहते हैं ।
आज शायद ललिता साथ में थी, इसीलिए नहीं पिए थे । चुपचाप थोड़ी देर बैठे । फूल ने चाय बनाई । नींबू वाली लाल चाय । भर गिलास चाय पी लिए, तब बात शुरू की । उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय का फैक्स नम्बर चाहिए था । संदेश देकर ललिता को खूब सबेरे बुलवाया था और प्रधानमंत्री के नाम एक चिट्ठी लिखवाई थी । चिट्ठी पढ़कर आँखें डबडबा गईं । छाती में एक हूक सी उठी । इसे सचमुच पी.एम.ओ. भेजना चाहिए । लेकिन फैक्स नम्बर एक बड़ी समस्या थी ।
हालाँकि बन्दी के एक सप्ताह से ज्यादा दिन बीत गये थे । हाकिम-हुक्काम का पाट पर आना-जाना बढ़ गया था । शिन्डाल्को मैनेजर पाण्डे जी, ‘वेदांग’ कम्पनी की गाड़ियाँ खूब सक्रिय थीं । लेकिन यह नम्बर कौन देगा ? यह समझ में नहीं आ रहा था । रूमझुम भाई ने ही इशारा किया कि एम.पी. साहब बता सकते हैं । उनके पास पहले के पाँच-सात पेज ऐसे ही सारे टेलीफोन-फैक्स नम्बर लिखे हुए हैं।
ठीक बात है । एकदम सही बात । कौन कहता है कि खिसक गए हैं रूमझुम भाई । चिट्ठी में भी जितनी बातेें थीं, हम जैसे रोज अखबार पढ़ने वाले को भी उतनी जानकारियाँ नहीं थीं ।
चिट्ठी की लिखावट बहुत ही सुन्दर थी । एकदम गोल-गोल । मोतियों जैसी । मुझे यह मालूम नहीं था कि मेरी सहिया जितनी सुन्दर है, उसके अक्षर भी उतने ही सुन्दर हैं । लेकिन खत का मजमून बहुत ही उदास करने वाला, भयावह हकीकतों से भरा था । मजमून कुछ ऐसा था -
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