इससे हर कोई परिचित है कि राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में
भारी-भरकम रकम मिलती है, लेकिन इसका अनुमान शायद ही कुछ लोगों को हो कि
उनके पास पैसा बरसता है। राजनीतिक दलों पर निगाह रखने वाली दो गैरसरकारी
संस्थाओं की ओर से जुटाई गई यह जानकारी चकित करने वाली है कि वर्ष 2004 से
2011 के बीच महज पांच राजनीतिक दलों को चंदे से मिली रकम चार हजार करोड़
रुपये भी अधिक रही। कांग्रेस, भाजपा समेत माकपा, बसपा और सपा को चंदे से
मिलने वाली राशि का विवरण सामने आने से यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीतिक
दल जब सत्ता में होते हैं तो उन्हें चंदा देने वाले लोग भी बढ़ जाते हैं।
इसकी व्याख्या चाहे जिस रूप में की जाए, लेकिन सभी दलों का कूपन के जरिये
मिली राशि का हिस्सा कहीं ज्यादा होना यह स्पष्ट करता है कि वे हिसाब-किताब
के मामले में ईमानदार नहीं। जिस तरह सभी दलों ने यह बताने की कोशिश की कि
उन्हें ज्यादातर आय 20-20 हजार रुपये वाले कूपन बेचकर हुई उससे यह साफ है
कि वे सच्चाई छिपा रहे हैं। दुर्भाग्य से मौजूदा नियम-कानून इसमें सहायक
बने हुए हैं। चूंकि राजनीतिक दल 20 हजार रुपये से कम की राशि का विवरण देने
के लिए बाध्य नहीं इसलिए वे यही जाहिर करते हैं कि उन्हें इतनी ही राशि
देने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक रहती है। जब तक जनप्रतिनिधित्व कानून
में परिवर्तन कर दलों को इसके लिए विवश नहीं किया जाता कि वे चंदे के रूप
में मिलने वाली हर छोटी-बड़ी धनराशि का विवरण दें तब तक यह लगभग तय है कि
उन्हें अज्ञात स्त्रोतों से भारी-भरकम धनराशि मिलती रहेगी। इसके आसार
बिल्कुल भी नहीं हैं कि राजनीतिक दल अपने स्तर पर ऐसी कोई कोशिश करेंगे कि
चंदे के लेन-देन की प्रक्रिया पारदर्शी हो। इसके लिए तो निर्वाचन आयोग को
सक्रिय होना होगा।
चुनाव सुधारों के लिए सक्रिय संगठन एक लंबे अर्से से इसके लिए मुहिम
छेड़े हुए हैं कि राजनीतिक दलों के आय-व्यय का हिसाब और अधिक पारदर्शी बनाया
जाए, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिल पा रही है। इससे इन्कार नहीं कि
राजनीतिक दल का संचालन करना एक कठिन कार्य है और इसके लिए अच्छे-खासे धन की
आवश्यकता होती है, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं कि यह धन अज्ञात स्त्रोतों से
आए। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि राजनीतिक दलों को अज्ञात स्त्रोतों
से चंदे के रूप में जो भारी-भरकम पैसा मिल रहा है उसमें कालेधन की भी
हिस्सेदारी रहती है। ऐसे राजनीतिक दल देश को कोई दिशा नहीं दे सकते जिनके
संचालन में कालेधन की भी भूमिका हो। यह चिंताजनक है कि न तो चुनाव सुधारों
की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा है और न ही कालेधन के कारोबार पर अंकुश लगाने
की कोई ठोस पहल हो रही है। इस संदर्भ में इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती
कि राजनीतिक दलों से उनके चंदे का जो विवरण सामने आया वह बड़ी मुश्किल से
हासिल किया जा सका है। बेहतर हो कि राजनीतिक दल चुनाव सुधारों की दिशा में
स्वेच्छा से आगे बढ़ें और सबसे पहले चंदे की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं।
यदि वे ऐसा नहीं करते तो आम जनता के बीच उनकी छवि और अधिक गिरेगी। उन्हें
यह अहसास होना चाहिए कि उनकी बदनामी बढ़ती जा रही है। इस स्थिति के लिए वे
स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
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