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Wednesday, September 12, 2012

बेहिसाब धन

चुनाव सुधारों के लिए सक्रिय संगठन एक लंबे अर्से से इसके लिए मुहिम छेड़े हुए हैं कि राजनीतिक दलों के आय-व्यय का हिसाब और अधिक पारदर्शी बनाया जाए, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिल पा रही है। इससे इन्कार नहीं कि राजनीतिक दल का संचालन करना एक कठिन कार्य है और इसके लिए अच्छे-खासे धन की आवश्यकता होती है, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं कि यह धन अज्ञात स्त्रोतों से आए। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि राजनीतिक दलों को अज्ञात स्त्रोतों से चंदे के रूप में जो भारी-भरकम पैसा मिल रहा है उसमें कालेधन की भी हिस्सेदारी रहती है। ऐसे राजनीतिक दल देश को कोई दिशा नहीं दे सकते जिनके संचालन में कालेधन की भी भूमिका हो। यह चिंताजनक है कि न तो चुनाव सुधारों की दिशा में आगे बढ़ा जा रहा है और न ही कालेधन के कारोबार पर अंकुश लगाने की कोई ठोस पहल हो रही है। इस संदर्भ में इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राजनीतिक दलों से उनके चंदे का जो विवरण सामने आया वह बड़ी मुश्किल से हासिल किया जा सका है। बेहतर हो कि राजनीतिक दल चुनाव सुधारों की दिशा में स्वेच्छा से आगे बढ़ें और सबसे पहले चंदे की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएं। यदि वे ऐसा नहीं करते तो आम जनता के बीच उनकी छवि और अधिक गिरेगी। उन्हें यह अहसास होना चाहिए कि उनकी बदनामी बढ़ती जा रही है। इस स्थिति के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार हैं।

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