उनके उच्च पद पेशे से लाखो रुपया माह की आमदनियो के साथ उन्हें उच्च वर्गीय शोहरत सुविधाए मिलती रही है | धनाढ्य वर्गो व सत्ता सरकार के लोगो के साथ इनके सम्बन्ध बनते व गहरे होते रहे है | इसी के फलस्वरूप पिछले बीस सालो से लागू होती रही वैश्वीकरणवादी नीतियों के विरोध में यह उच्च नागरिक समाज कभी नही खड़ा हुआ | तब भी नही खड़ा हुआ जबकि व्यापक जनसाधारण की समस्याओं के साथ चौतरफा भ्रष्टाचार की समस्याए इन नीतियों के बढ़ते चरण के साथ और ज्यादा बढती रही | ऐसी स्थिति में देश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों से सरकारी एवं गैर सरकारी उच्च संस्थाओं , व्यक्तियों से भ्रष्टाचार को दूर करने के किसी गम्भीर प्रयास की उम्मीद नही की जा सकती |ऐसी कोई उम्मीद रखना अपने आप को धोखा देना है | जन साधारण को धोखे में रखना है | इसको एक और तरीके से भी समझा जा सकता है |वह इस तरह से की लोक पाल विधेयक या जन लोक पाल विधेयक को पास करने के बाद आखिर वह लागू तो सत्ता सरकार के द्वारा ही होगा | उसके द्वारा बनाई गई संस्थाओं के जरिये ही होगा उस संस्था से व नागरिक समाज के उच्च से ही तो आयेंगे | जिनके स्वयं के भ्रष्ठाचारियो के साथ के रोज मर्रा के बढ़ते संबंधो के बारे में ख़ास कर वैशिविकरणवादी नीतियों के लागू होने के बाद से कोई शक -शुबहा करने की गुंजाइश नही है |तब क्या ऐसी किसी संस्था से भ्रष्टाचार विरोधी विधेयक को ठीक से लागू करने कराने की बात सोची जा सकती है ? क्या ऐसा कोई विधेयक बढ़ते भ्रष्टाचारके लिए प्रत्यक्ष नजर आने वाली वैश्वीकरणवादी नीतियों , सुधारों को रद्द कर सकने की सिपारिश करेगा ? क्या ऐसी कोई सिपारिश उच्च नागरिक समाज से सुनाई पड़ रहा है ? यदि नही तो ऐसे विधयेक तथा ऐसी संस्थाओं से भ्रष्टाचार मिटने वाला नही है | इसके विपरीत सच बात तो यह है कि अगर ऐसी कोई संस्था बनती भी है तो वह उच्च स्तर पर व्याप्त चौतरफा भ्रष्टाचार का अंग बने बिना नही रह सकती | इसलिए लोक पाल विधेयक के मसौदे पर वाद - विवाद होने दीजिये , उसके बारे में उसे लेकर प्रचार माध्यमी चर्चाओं को सुनते जाए , लेकिन यह भी सोचिये कि बढ़ते भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा कैसे ? इस काम को आखिर करेगा कौन ? यह सवाल इसलिए खड़ा है कि राज्य के तीनो अंगो पर भ्रष्टाचारी होने का आरोप अब खुलेआम लग रहा है | नागरिक समाज के लोग ही लगा रहे है | सरकारों को चुनावी वोट व समर्थन देने के वावजूद अब देश के बहुसख्यक जन साधारण भी इस नतीजे पर पहुचते जा रहे है कि वर्तमान राज व्यवस्था इस पर अंकुश नही लगा सकती | इन स्थितियों में अब बढती जन समस्याओं के उपयुक्त समाधान के लिए तथा भ्रष्टाचार आदि पर अंकुश लगाने के लिए भी नये ढंग के राज व्यवस्था की नये ढंग के संविधान व सत्ता सरकार कि अपरिहार्य आवश्यकता आ खड़ी है | देशी व विदेशी धनाढ्य हिस्सों को छूट दर छूट देने वाली वर्तमान जनतांत्रिक राज्य की जगह उन पर नये जनवादी राज्य के निर्माण की भी अपरिहार्य आवश्यकता खड़ी हुई है | जनसाधारण के छूटो अधिकारों को बढावा देने वाले तथा भ्रष्टाचारपर अधिकाधिक अंकुश लगाने वाले राज की अर्थात जनसाधारण द्वारा संचालित व नियंत्रित जनवादी राज्य की आवश्यकता आ खड़ी हुई है | भ्रष्टाचार के सम्बन्ध के सम्बन्ध में अब मामला केवल वर्तमान सत्ता - सरकार द्वारा लागू किये जाने वाले किसी नये विधेयक का नही रह गया है | वर्तमान दौर कि सत्ता - सरकारों में विद्यमान छोटे -बड़े छिद्रों से बढ़ते रहे धन - पूंजी के भ्रष्टाचार ने हर विधेयक व कानून को रोकने में नकारा साबित कर दिया है | इसलिए मांग केवल जन लोक पाल विधेयक की नही होनी चाहिए , बल्कि जनसाधारण के हितो में विधेयको को बनाने व लागू करने वाले जनवादी राज्य की भी मांग होनी चाहिए | उसके लिए जन साधारण के व्यापक समर्थन एवं सक्रिय भागीदारी की जरूरत है ।तभी जन लोकपाल की सार्थकता है।
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