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Friday, August 5, 2011

गीत क असली सार्थकता उसके माधुर्य में नही , उसकी लीनता में है

यह सवाल नही है कि स्वर मधुर है या नही | क्योंकि कोई गीत बाज़ार में बेचने के लिए नही है , गीत तो अहोभाव के लिए है | और गीत कि असली सार्थकता उसके माधुर्य में नही , उसकी लीनता में है | तुम उसमे लीन हो सकते हो | तुम उसमे इतने लीन हो सकते हो कि तुम बिलकुल मिट जाओ | तुम बचो न और गीत ही बचे| गुनगुनाहट रह जाए और करता खो जाए | गीत ही बचे और गायक समाप्त हो जाए |यह हो सकता है | और यह सरलतम है | इससे ज्यादा सरल धागा तुम न पा सकोगे | पक्षी गा लेते है , पौधे गुनगुना लेते है , झरने गाते है | तुम इतने असमर्थ हो क्या कि झरनों का मुकाबला भी न कर सको ? कि पक्षियों का मुकाबला भी न कर सको ? कि वृक्षों से भी होड़ न ले सको ?
   .                                                                                                                            कबीर

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