छत्तीसगढ़ में सलवा जुड़ूम और कोया कमांडो को भंग करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पीछे यही भावना है कि माओवाद हो या कोई अन्य उग्रवाद- उससे लड़ने के लिए सरकार कानून के रास्ते से नहीं हट सकती। कोया कमांडो के तहत ऐसे आदिवासी नौजवानों को भर्ती किया गया, जो न पर्याप्त पढ़े-लिखे हैं, न ही उन्हें किसी नियमित सरकारी बल की तरह प्रशिक्षण दिया गया और सिर्फ तीन हजार रुपए महीने का भत्ता देकर उन्हें माओवादियों से लड़ने में झोंक दिया गया। इससे एक तरफ ये नौजवान और उनके परिजन माओवादियों के निशाने पर आ गए, दूसरी तरफ वैध तौर-तरीकों एवं कानून के प्रति उत्तरदायित्व से उनके अवगत न रहने के कारण उनकी कार्रवाइयों से मानवाधिकार हनन संबंधी प्रश्न अक्सर खड़े होते रहे।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का संदेश साफ है। माओवाद से ऐसे नहीं लड़ा जा सकता। सरकार उचित बल तैयार करने और कानून के प्रति अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती।
चूंकि सलवा जुड़ूम और कोया कमांडो छत्तीसगढ़ सरकार ने खड़े किए, लेकिन यह सारा काम केंद्र सरकार से मिली वित्तीय सहायता से किया गया, इसलिए उन दोनों को सुप्रीम कोर्ट की आलोचना का शिकार होना पड़ा है।
छत्तीसगढ़ में हाल के महीनों में हुई कुछ घटनाओं की जांच से असंतुष्ट सर्वोच्च न्यायालय ने अब उनकी सीबीआई जांच का आदेश दिया है। स्पष्टत: सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से कानून के राज में आमजन का भरोसा बढ़ेगा। अब सरकारों को चाहिए कि वे इस पूरे घटनाक्रम से उचित सीख लें।
माओवद निस्संदेह एक बड़ी समस्या है, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था में लोगों का विश्वास मजबूत करके ही उससे बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है। इसलिए सरकारों को सुरक्षा के वैध एवं संवैधानिक माध्यमों को मजबूत करना चाहिए। वे अपनी जिम्मेदारी नागरिकों की निजी मिलिशिया (सेना) को नहीं सौंप सकतीं।
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