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Thursday, November 25, 2010

विसंगति समाप्त होनी चाहिए

शिक्षा के बाजारीकरण के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
के दुर्ग जिले के कार्यकर्ताओं ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया ।    वक्ताओं ने शिक्षा के बाजारीकरण के मुद्दे पर केन्द्र सरकार पर जमकर प्रहार किया ।  उपस्थित छात्रों और नागरिकों को संबोधित करते हुए अभाविप के प्रदेश व्यापारीकरण के चलते शिक्षा की
स्थिति दिन प्रतिदिन चिंताजनक होती जा रही है । यह आने वाले समय के लिए
अच्छा संकेत नही है, इसलिए अभाविप ने देश भर में शिक्षा के बाजारीकरण के
विरोध में आवाज उठाने का निर्णय लिया है  शिक्षा का बाजारीकरण देश की एक बड़ी समस्या बन चुका है, आज शिक्षा
माफियाओं के चंगुल में है । गरीब छात्रों से शिक्षा दूर होती जा रही है ।
निजीकरण के नाम पर शिक्षा का बाजारीकरण किया जा रहा है । शिक्षा के
केन्द्र को मंदिर की उपमा दी जाती है लेकिन शिक्षा माफियाओं द्वारा इस
मंदिरों को दुकान और विद्यार्थियों को ग्राहक बना दिया गया है । प्रायवेट
शिक्षा संस्थान निरंकुश होकर मनमानेपूर्ण ढंग से फीस और अन्य मदों के नाम
पर छात्रों से बेतहाशा पैसा वसूल रहे हैं इन निजी शिक्षा संस्थानों के
लिए शिक्षा सेवा का नही बल्कि व्यापार का माध्यम बन चुकी है ।
इंजिनियरिंग और मेडिकल सहित तमाम पाठ्यक्रमों की सीटें इन निजी संस्थानों
द्वारा मनमाने दामों पर बेची जा रही है, गरीब और मध्यम वर्ग का
प्रतिभावान छात्र आज डाक्टर और इंजिनियर बनना तो दूर की बात है डॉक्टर और
इंजिनियर बनने का सपना भी नही देख सकता है । शिक्षा के बाजारीकरण की इस
प्रवृत्ति पर अंकुश लगना जरुरी है । शिक्षा को बिकने वाली वस्तु के रुप
में देखने का दृष्टिकोण भारतीय चिंतन के विपरीत है ।
       राजेन्द्र पाध्ये ने कहा कि सच्चाई यह है कि देश के स्वतंत्र होने के
बाद से ही शिक्षा क्षेत्र को पूरी तरह से उपेक्षित रखा गया । भारत के
स्वतंत्र होने 39 साल बाद पहली बार 1986 में शिक्षा नीति बनाई गई देश 39
सालों तक देश की कोई शिक्षा नीति ही नही थी देश इतने सालों तक बिना किसी
शिक्षा नीति के चलता रहा । स्वतंत्र होने के बाद जिन लोगों के हाथों में
देश की कमान गई वे कभी भी शिक्षा को लेकर गंभीर नही थे । उनकी गलत
नीतियों के कारण ही देश में शिक्षा के हालात बदतर हुए, शिक्षा का
बाजारीकरण के लिए यही लोग जिम्मेदार है आज भी उन्ही की परिपाटी वाले लोग
दिल्ली की गद्दी पर बैठे हैं इन लोगों ने  शिक्षा को प्रयोगशाला बना दिया
है ।
       उन्होने कहा कि अभाविप की हमेशा से मांग रही है कि उच्च शिक्षा के लिए
केन्द्रीय स्तर पर एक स्थायी समिति बनाई जानी चाहिए जो कि देश में एक ही
पाठ्यक्रम के लिए एक जैसा फीस स्ट्रक्चर तय करे । आज एक ही पाठ्यक्रम के
लिए छत्तीसगढ़ में अलग फीस ली जाती है मध्यप्रदेश में अलग, महाराष्ट्र और
राजस्थान में अलग । यह विसंगति समाप्त होनी चाहिए । फीस स्ट्रक्चर के
मामले में पूरे देश में एकरुपता होनी चाहिए । यह तभी हो सकेगा जब इसके
लिए केन्द्रीय स्तर पर स्थायी समिति बनाई जाएगी ।
  शिक्षा को गरीब और मध्यम वर्ग के छात्रों कीपहुंच से दूर करने की कोशिश हो रही है यह एक प्रकार का शोषण है शिक्षा काबाजारीकरण बंद होने से ही यह शोषण रुकेगा
अभिभावकों को भी आगे आना होगा और अभाविप की मुहिम में उसका बढ़ चढ़ कर
साथ देना होगा ।
     

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