सआदत हसन मंटो और इस्मत चुग़ताई को लीक से हटकर जीने वाले लोगों में शुमार किया जाता है. दोनों अपनी तरह के एक ही थे और अपनी इसी पहचान
एक ओर अगर मंटो से अपनी पहचान को गुलज़ार ने अपने ही अनूठे अंदाज़ में पेश किया तो दूसरी ओर हिंदी की कहानीकार पदमा सचदेव ने इस्मत चुग़ताई से अपनी पहचान पेश की. ऐसा लगा जैसे इन दोनों ने उन दोनों को सबके सामने ज़िंदा कर दिया. बहुत से लोग मंटो और इस्मत को एक सिक्के के दो पहलू की तरह देखते हैं. मंटो ने भी एक बार कहा था अगर मैं औरत होता तो इस्मत होता या इस्मत अगर मर्द होती तो वह मंटो होती.
बहरहाल, चलिए देखते हैं पहले फ़िल्मकार और गीतकार गुलज़ार क्या कहते हैं मंटो के बारे में: मंटो को कुछ सुना है, कुछ देखा है, कुछ पढ़ा है. बस इसी तरतीब से मैं उन्हें जानता हूं. मुझे याद है उनकी मौत पर राजेंद्र सिंह बेदी साहब ने फ़र्माया था, "अपनी तमाम बदमाशियों के बावजूद वह हम सब का लाडला था, एक बिगड़े हुए बच्चे की तरह वह अपनी ज़िंदगी से बहुत खिलवाड़ करता रहा, एक फ़नकार की हैसियत से उसे अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास भी होना चाहिए था."
मंटो अगर ऐसा ही सतर्क होता तो फिर ये मंटो न होता. ये भी सुना है कि वह बहुत ज़िद्दी था. मंटो एक बार अहमद नदीम क़ासमी के दफ़्तर पहुंचे जो उस समय 'नक़ूश' (लाहौर से प्रकाशित मशहूर पत्रिका) के संपादक थे. मंटो उनसे कहने लगे, "15 रुपए दे दीजिए शराब लेनी है." मंटो पहले से जानते थे कि क़ासमी साहब उसे शराब के लिए पैसा नहीं देंगे, लेकिन एक शरारत, एक शोख़ी, मंटो का ही हिस्सा थी.
क़ासमी साहब ने साफ़ कह दिया, "मंटो मैं तुम्हें शराब के लिए पैसे नहीं दे सकता, अफ़्साने (कहानी) के लिए तुम्हें पेशगी दे सकता हूं." मंटो चले गए और क़ासमी साहब के अनुसार एक घंटे बाद फिर आ धमके साथ में नया अफ़साना था, क़ासमी साहब ने उन्हें 15 रुपए दे दिए. पैसे जेब में रखकर मंटो बोले, "शराब महंगी ज़रूर है लेकिन अफ़साना भी इतना सस्ता नहीं." क़ासमी साहब ने 15 रुपए और दिए तो पैसे जेब में रख कर जाते हुए कहने लगे, "बाक़ी अफ़साना छपने के बाद ले लूंगा."
मंटो से बेहतर मंटो को कोई नहीं जानता. 'मैं क्यों लिखता हूं?' सवाल का जवाब मंटो कुछ यूं देते थे - "ये एक ऐसा सवाल है कि मैं क्यों खाता हूं क्यों पीता हूं, लेकिन इस लिहाज़ से अलग है कि खाने और पीने पर मुझे रुपए ख़र्च करने पड़ते हैं. लेकिन जब लिखता हूं तो मुझे नक़दी के रूप में कुछ ख़र्च नहीं करना पड़ता...." "मंटो लिखता इसलिए है कि वो ख़ुदा जितना बड़ा अफ़साना साज़ और शायर नहीं--- ये उसका करम है कि वह उससे लिखवाता है."
उनका एक बड़ा मशहूर वाक़या है जो उन्होंने 1944 में नए साल के दिन मुंबई में पढ़ा था, "ये मेरा नाम है, लेकिन कुछ लोग प्रगतिशील साहित्य को सआदत हसन मंटो भी कहते हैं. और जिन्हें मर्द पसंद नहीं वह उसे इस्मत चुग़ताई भी कह लेते हैं." "मैं चीज़ों के नाम रखने को बुरा नहीं समझता, मेरा अपना नाम अगर न होता तो वो गालियां किसे दी जातीं जो अब तक हज़ारों और लाखों की तादाद में अपने आलोचकों से वसूल चुका हूं. नाम हो तो गालियां और शाबाशियां देने-लेने में बहुत सहूलियत होती है."
अपनी कहानी के पात्रों के चुनाव के बारे में मंटो कहते हैं, "मेरे पड़ोस में अगर कोई महिला हर दिन अपने पति से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ़ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए ज़रा भी हमदर्दी पैदा नहीं होती. लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई महिला अपने पति से लड़कर और आत्महत्या की धमकी दे कर सिनेमा देखने चली जाती है और पति को दो घंटा सख़्त परेशानी में देखता हूं तो मुझे हमदर्दी होती है."
"किसी लड़के को लड़की से इश्क़ हो जाए तो मैं उसे ज़ुकाम के बराबर भी अहमियत नहीं देता." "चक्की पीसने वाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को चैन से सो जाती है मेरे अफ़सानों की नायिका नहीं हो सकती, मेरी नायिका चकले की रंडी हो सकती है जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी ये ख़्वाब देखती है कि बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक देने आया है."
मंटो को मुंहफट कहा जाता रहा, फ़हश यानी अश्लील लिखने के लिए उन पर मुक़दमा भी चलाया गया लेकिन वह कहते हैं: "मुझमें जो बुराईयां हैं वह इस युग की बुराईयां हैं मेरे लिखने में कोई खोट नहीं. जिस खोट को मेरे नाम किया जाता है वह कमी मौजूदा व्यवस्था की है. मैं हंगामापसंद नहीं. मैं सभ्यता, संस्कृति और समाज की चोली क्या उतारुंगा जो है ही नंगी."
फ़िल्मों में रहकर उन्होंने बहुत सी फ़िल्मी हस्ती पर कहानियां
इसी में वह बड़े स्पष्ट अंदाज़ में कहते हैं, "आग़ा हश्र की भेंगी आंख मुझसे सीधी नहीं हो सकती, उसके मुंह से गालियों के बजाए मैं फूल नहीं झड़वा सकता. मीरा जी की ज़लालत पर मुझसे स्त्री नहीं हो सकती, और न मैं अपने दोस्त श्याम को मजबूर
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