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Thursday, December 24, 2009

काँच की बरनी और दो कप चाय

काँच की बरनी और दो कप चाय -
एक बोध कथा

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और
जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है, और हमें लगने लगताहै कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है । दर्शनशात्र के एकप्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्र से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की
बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समानेकी जगह नहीं बची... उन्होंने छात्र से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ?
हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरनेशुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी, समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा,
क्या अब बरनी भर गई है, छा ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस
जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे
... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ..अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी
रेतके बीच में स् थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोगअपना जीवन समझो...
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वा और शौक हैं, छोटे कंकरमतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और&am p;nb sp;रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें,
मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदितुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते,
रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास
मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा...
मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तु तय करना है। अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो, सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको,मेडिकल चेक-अप
करवाओ..टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यानसे सुन रहे थे.. अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह
नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच हीरहा था कि अभी तक&n bsp ;ये सवाल किसी ने नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे,
लेकिन अपनेखास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये

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