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Monday, May 25, 2009

इंडियन पीपुल & leader

कब बनेगी जनआपेक्षाओं की वास्‍तविक सरकार।



किसने बनाया सरकार चुनने वाले हाथों को लचर और कमजोर ।

क्‍या लालू, मुलायम, माया व पासवान ने

- पांच सालों में एक दफा वोटिंग जिनका अधिकार है, वे कैसे चुन सकते हैं जनसरकार।

तो क्‍या है उपाय कुछ भी नहीं।

मतदाताओं ने उपाय खोज है मनमोहन को फिर से पीएम बनाकर

सोनिया व राहुल पर भरोसा जताकर।



क्‍योंकि जनतंत्र तब तक नहीं बदलती जब तक कि पानी सिर से बहने न लगे

जबकि इस अथाह गर्मी में शिवनाथ सूख चुका है। इस बार भी बदलाव की कोई बयार नहीं

लेकिन इस बार टूटी है मिथक



इस बार भी जनता नहीं चुनने वाली जनसरकार यह चुनाव भी महज औपचारिकता साबित होने वाली है।निर्विकल्‍प जनता, भ्रामक वादेंझूठी लडाई।

यही है।

(यह स्‍क्रीप्‍ट है चुनाव के पहले का)

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(अब बात चुनाव के बाद)

जनता ने दिया है एक संदेश

मनमोनहर के विकास को दिया है समर्थन

क्‍या भारतीय मतदाताओं ने मनमोहन के रूप में चुन लिया है जनआपेक्षाओ की सरकार।

भले ही अभी इस सरकार का वास्‍‍तविक जनसरकार साबित होने में समय है। मगर क्‍या जनादेश इसी दिशा में गई है।





जनादेश के मायने

पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव में देश के बहुसंख्‍य मतदाताओं की राय कांग्रेस के पक्ष में गई है। चुनाव में जनता ने विकास के मुद़दे पर सरकार चुना। एक समय कहा जाता था कि चुनाव में विकास कोई मुख्‍य मुद़दा नहीं होता। ताजा लोकसभा चुनाव में मिथक साबित हुआ है

इसके विपरीत छत्‍तीसगढ में मतदाता ने पूरी तरह भाजपा को चुना है। इस चुनाव में भाजपा के लिए छग ि‍फर से सर्वाधिक मजबूत किला साबित हुआ है। अटल के बाद आडवानी की अगुवाई में भाजपा का देश भर में सबसे कमजोर प्रदर्शन के दौरान भी छग में भाजपा को मजबूत समर्थन मिला। तो क्‍या इसका मतलब यह है कि राज्‍य में रमन सरकार की जादू चल रही है।

‘’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’किस दिशा में जा रहे हम
मै दावे के साथ नहीं कह सकता, कि हम किस दिशा में जा रहे है। नीतिकारों में की अलग अलग राय भ्रम में डालती है। एक और उम्‍मीद है दूसरी ओर नाउम्‍मीदी। मेरे जैसा सामान्‍य समझ का इंसान इस हालात में पूरे विश्‍वास के साथ कुछ भी तय नहीं कर सकता।
और इस अपने देश में, मै अकेला नहीं। बल्कि इस वर्ग के लोग इस देश में 35 करोड से कम नहीं।मै नहीं समझ पा रहा हूं तो क्‍या*::::::::::::::::::::: समझने वाले समझाएंगे हमें। हम उम्‍मीद से देख रहे हैं समझने वाले को, कि कब वे हमें समझाना शुरू करते है।

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