Total Pageviews

Tuesday, May 5, 2009

पिछले दो दशकों के तूफानी दौर

पिछले दो दशकों के तूफानी दौर
अमित जोगी ने अपने ब्‍लाग आधी आजादी में स्‍लमडाग मिलेनियर पर मैना यह शब्‍द देखा-पिछले दो दशकों के तूफानी दौर।
पिछले दो दशकों के तुफानी दौर ने हमारी पूरी जीवन पद्धति बदल दी है। मुझे लगता है, उम्‍मीद व निराशा के पाटों में बंटे जनसमाज ने मिलकर बीच का एक बड़ा तबका रच डाला है देश में मीडिल वर्ग के 35 करोड़ लोगों के बड़ा तबके का एक बड़ा हिस्‍सा खुद को असुरक्षित समझने लगा है। उनमें यह आस्‍था दृढ़ हुई है कि पैसे के अलावा भविष्‍य में किसी अन्‍य के काम आने की ज्‍यादा गारंटी नहीं। मुझे स्‍वीकार करने में कोई संकोच नहीं, कि मैं स्‍वयं इस परिपाटी का हिस्‍सा हूं।
यद्यपि बड़े लोगों के लिए एक-दो करोड़ रूपया अब अधिक राशि नहीं रह गई है. लेकिन मीडिल का एक औसत परिवार ईमानदारी के दम पर जिंदगी भर में इतना ही संपत्ति नहीं बना पाता। उसके सामने हमेशा मीडिल वर्ग से बाहर निकाल दिए जाने का खतरा बरकरार रहता है। ऐसे में यदि स्‍लमडाग मिलेनियर का नायक एक साथ दो करोड़ रूपए जीतता है तो वह हमारे ही सोच का आदर्श प्रतिंबिंब बनता है।
दरअसल आम हिंदुस्‍तानी पिछले 25 सालों में पाने से ज्‍यादा खोता ही गया है। हालिया दौर में मीडिल वर्ग का जीवन खोने की परिभाषा में इब्‍तदा होता गया है। लेकिन यह खोना ऐसा नहीं कि यह तबका कंगालपति होकर सड़क पर आ गया हो। ऐश्‍वर्य व भौतिक सुविधा जुटाने के बावजूद अंदर से कुछ खो गया है। खुशी दूर होती जा रही है। जीवन जीने की कला सिखाने वालों के शरण में जाना पड़ रहा है। यूं लगता है जैसे बहुत लोगों का जीवन विवशता का सबब बन चुका हो। अंदर की छटपटाहट, मायुसी व अशांति के इस जड़कन से बाहर तो निकलना चाहता है, पर रास्‍ते नहीं दिख रहे हैं।
।/:********************************************
आमिर खान की फिल्‍म तारें जमीं पर, और स्‍लमडाग मिलेनियर इसी उम्‍मीद व निराशा के दो धु्व्रों का प्रकटीकरण करते है। एक ओर उन बच्‍चों को संवारने का जद़दोजहद है तो दूसरी ओर स्‍लमडाग में बच्‍चों को अपाहिज कर भीख मंगवाने वाले गिरोह भी हमारे ही समाज के हिस्‍से है।
.ऋतेष 94076 58286

2 comments:

  1. amit jogi
    sanjiv tiwari
    sandip tikariha
    shailesh nitin trivedi
    plz send me comments

    ReplyDelete

http://rktikariha.blogspot.com/